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मन का रोना गाना

ऐ मन कितना रोयेगा अब तू अब तो तेरे रुलाने वालो के लिए भी लोग रोने लगे है। कुछ झूम कुछ नाच यु ना वक्त गवा उनके लिए जो कभी तेरे अपने थे ही नही। सुन संभल सुधर देख जरा वो आखे जो कब से तेरे झूमने का रास्ता देख रही। जी कभी उनके लिए जो तेरी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी देख रही। क्यों गुजरता है वक्त उनकी फिकर में जिनके लिए तेरी ख़ुशी के मायने ही नही॥ उठ संभल  चल पकड़ अपनी राह बड़ा कदम शायद उस खशी को भी तेरी आस है । क्यों रोता है इन छोटी छोटी कठिनाइयों से ये तो राहो की वो रेत है जो काम आएगी तेरे महलो की कलाओ में। उठ संभल और इकठ्ठा कर इन कठिनाईओ को ये ही है वो जो तेरे महलो का गुण जाएगी। अब महल बनाने में भी इतना न उछल तू, जी ऐसे की जहा भी जाये तू खुशियों के महल बनाये तू। झूम नाच गा खुश रह क्यों की न तुझे पता न मुझे की क्यों आये हम यहा । इतना झूम नाच की एक दिन खुदा आये तेरे पास और कही की ये बन्दे बताता हु की क्यों आया है यह तू ॥

सवाल अपनों की खुशी का

बुरा तो हमें भी लगा, पर क्या करे सवाल अपनो की खुशी का था। अड़ तो हम भी सकते थे, पर क्या करे सवाल अपनों की ख़ुशी का था। सही और गलत में मन मेरा भी उलझा था, क्या होगा क्या नही होगा सवाल मेरे मन में भी था। बहलाया हमने अपने मन को कहकर जो होगा देखा जायेगा। खुद की राहे बनाने का ख्वाब और दम हममे भी था, पर रुक गए। क्यु की सवाल अपनों की ख़ुशी का था॥