ये अकेला मन, ये ख़ाली पन्ने
कुछ बारिश की बुँदे, और चाय की चुस्की
शायद इसे ही शुकून कहते है ।।
ये कूदते ख़याल, ये भटकता दिमाग
और इनको चुपचाप निहारता ये स्वभाव
शायद इसे ही शुकून .....!!
ऊँची पहाड़ी मंजिलें, ये टेढ़ी मेड़ी राहे
और इसमें धीरे धीरे बढ़ते ये कदम
शायद इसे ही .............!!
यु घबराना, फिर सांसो का चढ़ जाना
और मन का सब समज पाना
शायद ..................!!
बुरा तो हमें भी लगा, पर क्या करे सवाल अपनो की खुशी का था। अड़ तो हम भी सकते थे, पर क्या करे सवाल अपनों की ख़ुशी का था। सही और गलत में मन मेरा भी उलझा था, क्या होगा क्या नही होगा सवाल मेरे मन में भी था। बहलाया हमने अपने मन को कहकर जो होगा देखा जायेगा। खुद की राहे बनाने का ख्वाब और दम हममे भी था, पर रुक गए। क्यु की सवाल अपनों की ख़ुशी का था॥
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